Wednesday, March 25, 2009

ऐ नाजनीन...

नाजनीन...



तू है मेरी यादों में,
हर पल हर लम्हा...
तेरा चेहरा मेरी आंखों में,
जब भी मै तनहा....

तेरी मुस्कराहट मेरे कानो में...
गूंजती है शहनाइयां...
तेरे बालों की पनाह में,
है मेरा आशियाँ...

तेरी आँखों की रौशनी में,
खोया खोया सा ये जहाँ...
तेरे जिस्म की खुशबू में,
महका सा ये समां...

तेरा ख्याल ही है बस,
जन्नत की दुनिया...
तू पास जाए तो,
मर जाऊं ना यहाँ

खुशियाँ तेरा दामन चूमे,
बस रब से है यही दुआ...
तू हरदम मेरे ख्वाबों में रहे...
नाजनीन तेरा शुक्रिया...

-सौरभ साहू


तन्हाई...

हम तो तनहा ही रह गए...


थी एक तमन्ना जीने की,
था एक बहाना मरने का,
ना यादेंरही, ना वादें रहे,
हम तो तनहा ही रह गए...
.
सपने जो थे इन आंखों में,
आंसूं से घुल गए साँसों में,
ना जख्म बचे, ना दर्द रहा,
हम तो तनहा ही रह गए...

जाने कैसे वो अरमान थे,
जाने वो कैसी कशिश थी,
ना राहें मिली, ना मंजिल मिले,
हम तो तनहा ही रह गए...

चाहतें कुछ हम्मे भी थी,
दिल की कुछ ख्वाहिशें भी,
ना दिल रहा, ना धड़कन रही,
हम तो तनहा ही रह गए...

इस पराये मतलबी दुनीया में,
कोई ना अपना बन सका,
हम थे, हम ही रहे,
हम तो तनहा ही रह गए...

-सौरभ साहू

Tuesday, March 24, 2009

कविता सविता में आपका स्वागत है !

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यहाँ पर हम बांटते हैं, अपनी रचनायें और भावनाएं

प्रस्तुत है, कुछ रचनाओं का संग्रह, सिर्फ़ आपके लिए...

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सौरभ